jharkhand-girl-dies-of-starvation_650x400_81508215105
आधार ही क्या अब जीवन का अधार है
आधार ही से क्या अब जीवन का संचार है
बन्द किवाड़ो के पिछे से सुनाई पड़ती है सिसकती आहें
 मैं भूख  – एक प्रश्न करती हूॅ
एक चिंतित सोच मे धिर गई हूं
मुझमे और मौत में यह क्या अनोखा रिश्ता है….
 ये कोलाहल कैसा ?
यह बेबसी क्यूं ?
पर क्या मेरा वजूद यही है ?
भूख से तिलमिलाती संतोषी मेरे विरह मे प्राण त्याग देती हे
उस की” भात भात भात  ” कहती जिह्वा अचानक लड़खड़ा कर खामोशियों के आंचल मे हमेशा के लिए सो जाती हे
कहीं दूर एक माॅ की ऑखो का तारा
उसी के ह्रदय को चीर खून की होली खेल
मुझे तृप्त करता है
क्यों इस देश के कार्यकर्ताओं को मैं दिखाई नहीं देती
क्यो मुझ से पीड़ित लोगों की गुम चीखें
उन के कानो में नहीं गूंजतीं
हाय ! क्यों मैं  अधार बन गई हूं लाखों कि मृत्यू का
मे  भूख अपना अधिकार माॅगती हुं
 अधिकार की मैं भी संतुष्ठ रहुं तृप्त रहूं
मौत का अधार न बन  लोगो की तुष्टि का अधार बनू…..

2 Comments

  1. Avatar K SHESHU BABU says:

    Well expressed poem

  2. Avatar K SHESHU BABU says:

    आधार बिना जीवन नीराधर है । आधार बिना मृत्यु भी नीराधर है । जीवन और मृत्यु आधार द्वारा बाध्य हैं । इस देश में मनुष्य आधार संख्या हैं।